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अकेलापन बना घातक

-सिद्वार्थ शंकर-

आज से दो साल पहले किसी व्यक्ति ने कोरोना जैसी महामारी की कल्पना भी नहीं की होगी। मगर तब ब्रिटेन में
वहां के लोगों का अकेलापन दूर करने बनाया गया एक मंत्रालय आज काफी काम आ रहा हैै। कोरोना काल में जब
एक-दूसरे का संपर्क भी कट गया तो समय पास करना भारी हो गया। उस समय इस मंत्रालय की जो लोग
आलोचना कर रहे थे, वे भी आज इस पर अध्ययन कर रहे हैं। बता दें कि अकेलेपन का दंश झेल चुकीं ट्रेसी क्राउच
को मंत्रालय का जिम्मा दिया गया था। दरअसल, ब्रिटेन के यूरोपियन यूनियन से अलग होने के बाद से ही वहां
अकेलापन चर्चा का विषय बना हुआ था। कुछ समय पहले आई एक रिपोर्ट ने यह बात पुख्ता की तो अकेलेपन से
जूझ रहे लोगों के लिए ब्रिटेन की पीएम टरीजा मे ने यह ऐतिहासिक फैसला लिया। गौरतलब है कि वर्ष 2017 की
कमीशन ऑन लोनलिनैस की रिसर्च के मुताबिक, ब्रिटेन में 90 लाख से ज्यादा लोग सबसे ज्यादा या हमेशा
अकेलापन महसूस करते हैं। रिसर्च में यह भी सामने आया कि लगभग दो लाख बुजुर्गों ने महीने भर से भी ज्यादा
वक्त से किसी दोस्त या करीबी से बात नहीं की। आज के दौर की जीवनशैली और बेपनाह जरूरतों के लिए हो रही
भागमभाग, दोनों ही इसके लिए जिम्मेदार हैं। ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टरीजा ने कहा भी है कि आधुनिक जिंदगी का
खामियाजा बहुत से लोग अकेलेपन के रूप में भुगत रहे हैं। हम मिलकर इस चुनौती का सामना कर सकते हैं और
ऐसे लोगों की मदद कर सकते हैं, जो किसी भी वजह से खुद को अकेला मान बैठे हैं। यकीनन बदलते सामाजिक
और पारिवारिक परिवेश में ऐसी मदद की दरकार दुनिया के हर हिस्से में है। तनहाई ने सभी को अपने घेरे में
जकड़ रखा है, जिसका अगला पड़ाव शारीरिक तथा मानसिक व्याधियों से घिर जाना है। आमतौर पर माना जाता है
कि अकेलापन मानसिक अस्वस्थता का ही कारण बनाता है, लेकिन अब कई शोध यह बात सामने ला रहे हैं कि
इससे शारीरिक व्याधियां भी जड़ेंं जमाती हैं। शिकागो विश्वविद्यालय में मनोवैज्ञानिकों ने देखा कि सामाजिक रूप
से अलग-थलग लोगों की प्रतिरोधक क्षमता में बदलाव हो जाता है। इतना ही नहीं युवाओं का एक बड़ा प्रतिशत
ऐसा भी है, जो शिक्षित है, सफल है पर अवसाद और अकेलेपन के चलते आत्महत्या जैसे कदम उठा रहा है। जो
कहीं न कहीं एकाकीपन की ही उपज है। सुख-दु:ख साझा करने का भाव भी अब किसी आयु वर्ग में नहीं दिखता।
सामाजिक संबंधों की बिगड़ती रूपरेखा और तकनीक ने मिलकर अकेलेपन को बढ़ावा दिया है। आभासी संसार की
दिखावटी दोस्ती और अनर्गल संवाद ने हालात और विकट कर दिए हैं। बड़ी पीढ़ी के लिए तो स्थितियां और भी
तकलीफदेह हैं। दुनिया भर में अकेलेपन के सबसे ज्यादा शिकार बुजुर्ग ही हैं। यह हमारे लिए भी चिंता का विषय है
क्योंकि युवा देश कहे जाने वाले भारत में भी बुजर्गों की संख्या कम नहीं है। अनुमान के मुताबिक 2050 तक
हमारी कुल जनसंख्या का चौथाई हिस्सा बुजुर्ग लोगों का ही होगा। भारत में साल 2026 तक वरिष्ठजनों की
आबादी 10. 38 करोड़ से बढ़कर 17. 32 करोड़ हो जाने का अनुमान है। गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र ने भी इस
विषय पर कई बार कहा है कि समय के साथ दुनियाभर में बुजुर्गों का अनुपात बढ़ता जाएगा। इसीलिए सरकारों को
जीवनयापन व देखभाल के संबंध में नए विकल्पों और उपायों पर गौर करना होगा। एक ओर युवा अपनी और
अपनों की उम्मीदों के बोझ तले अकेले हो रहे हैं वहीं, असुरक्षा और अकेलेपन को झेल रही बड़ी पीढ़ी सामाजिक
बिखराव का खामियाजा भी भोग रही है। खासकर महानगरों में तो स्थिति और भयावह है। ऐसे भी मामले सामने
आए हैं जिनमें किसी बुजुर्ग की मौत हो जाने के महीनों बाद भी आस-पड़ोस के लोगों को खबर तक नहीं होती। कई
चर्चित चेहरों की खबरें भी सुर्खियां बनती हैं कि वे कैसे जीवन में अकेलेपन से लड़ रहे हैं या जीवन के आखिरी
पड़ाव में एकाकीपन से जूझते हुए दुनिया से विदा हुए। अकेलेपन के चलते भावनात्मक टूटन की परिस्थितियां ऐसी
हैं कि चिकित्सकों के पास ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ रही है जो अपनों से संवाद को तरस जाते हैं। कभी सामाजिक
मेलजोल और पारिवारिक जुड़ाव के लिए दुनियाभर में पहचान रखने वाले भारत में भी अब अकेलेपन की समस्या
गंभीर होती जा रही है। अब देखने में आ रहा है कि करीबी रिश्तों में भी ऐसी दूरियां और औपचारिकता आ गई है।
इसीलिए आज उम्रदराज लोग ही नहीं युवाओं का भी एक बड़ा प्रतिशत स्वयं को समाज से कटा हुआ महसूस करता

है। सहअस्तित्व एवं आपसी सम्मान की सोच के साथ पीढिय़ों का साथ रहना, हमारे यहां साधारण बात रही है।
एकाकीपन के ऐसे हालात नैराश्य को जन्म देते हैं। अवसाद और दूसरी मनोवैज्ञानिक समस्याएं जड़ें जमा लेती हैं।
आज जब कोरोना महामारी ने सभी के सामने ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दी हैं जिसमें व्यक्ति अकेला है और
चाहकर भी कोई मदद को आगे नहीं आ सकता, ऐसे में इस दौर से बाहर आना काफी मुश्किल है। इसलिए न सिर्फ
भारत बल्कि सभी सरकारों को अपने नागरिकों को अकेलापन जैसी जकडऩ से बाहर निकालने के बारे में सोचना
शुरू करना होगा।

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