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अव्यवस्था के जंगलराज में नष्ट हो रहें जंगल

-सोनम लववंशी-

पर्यावरण और जीवन एक-दूसरे के पूरक हैं। एक में भी छेड़छाड़ करने का असर दूसरे पर भी पड़ता है। अब तक की
आई महामारियों ने इस बात को और भी साफ़ कर दिया है। पर्यावरण और महामारियों के बीच पुराना सम्बंध रहा
है। वह चाहें साल 1347 में यूरोप में फैली ब्लैक डेथ की बात हो, अमेरिका में 1610 में आया चेचक हो या फ़िर
1918 का स्पैनिश फ़्लू। हर दफ़ा पर्यावरणीय सन्तुलन के साथ खिलवाड़ होने पर किसी न किसी महामारी ने हमें
आईना दिखाया है। पिछले दो दशकों को ही ले लीजिए दुनिया ने कई वायरस जनित बीमारियों का सामना किया है।
इतना ही नहीं अब तक फैलने वाली चार में से तीन महामारियां जानवरों से इंसानों में आई है। वहीं पर्यावरणविदों
की मानें तो वनों की अंधाधुंध कटाई, क़ुदरत द्वारा प्रदत्त संसाधनों का अतिदोहन और जानवरों के असामान्य भक्षण
ने जैव विविधता की डोर को ही नहीं तोड़ा है, अपितु इसका खामियाजा हमें भी भुगतना पड़ रहा है।
भले ही कोरोना जानवरों से आदमी में आया यह थ्योरी अभी सत्यता के तराजू पर न मापी गई हो, लेकिन कोरोना
काल ने जैव विविधता के संरक्षण और वन संरक्षण की अहमियत को बता दिया है। कोरोना की दूसरी लहर में लोगों
को ऑक्सीजन की कमी से मरते हुए शायद ही कोई हो जिसने न देखा हो। महामारी के इस दौर में ऑक्सीजन की
किल्लत से यह बात साफ हो गई कि एक प्रकृति ही है जो बीना किसी मोल के हमारी जरूरतों को पूरा करती है।
कोरोना की दूसरी लहर में मौत का भयावह मंजर मध्यप्रदेश ने भी देखा है, लेकिन इसी बीच मध्यप्रदेश का
बकस्वाहा जंगल सुर्खियों में बना हुआ है। जिसकी वजह यहां के जंगलों में हीरे की खान होने की बात कही जा रही
है। कहा जा रहा है कि यहां पन्ना से भी 15 गुना अधिक हीरा मौजूद हो सकता है। जिसे निकालने के लिए इस
वन क्षेत्र को नष्ट करने की बात हो रही है। अब सवाल यह उठता है कि वन ज्यादा जरूरी है या फिर हीरे? इसको
लेकर सरकार से लेकर आमजन के अपने-अपने तर्क हो सकते हैं। लेकिन बड़ी बात यही है कि कोरोना काल से
हमनें क्या सीख ली है? क्या कोई और तरीका नही हो सकता जिससे हीरे भी निकाले जा सके और इस वन क्षेत्र
को भी सुरक्षित बचाया जा सके। इस क्षेत्र में करीब 2.5 लाख पेड़ है जो कि 382.131 हेक्टेयर जंगल मे है, जिन्हें
काटने की बात कही जा रही है। इसकी शुरुआत 20 साल पहले प्रोजेक्ट डायमंड बंदर के सर्वे के रूप में ही की जा
चुकी थी। तो वही 2 साल पहले प्रदेश सरकार ने इस जंगल की नीलामी तक कर दी थी जिसे आदित्य बिड़ला समूह
की एससेल्स माइनिंग एंड इंडस्ट्रीज ने 50 साल की लीज पर लिया है। 62.64 हेक्टेयर जमीन को मध्यप्रदेश
सरकार ने लीज पर दे रखा है वही कंपनी 382.131 हेक्टेयर जंगल की मांग कर रही है। उनका कहना है कि इस
जंगल से निकले मलवे को डंप करने के लिए उन्हें यह जमीन चाहिए। अगर ऐसा होता है तो यह तय मानिए की
इससे बक्सवाहा का पूरा जंगल ही स्वाहा हो जाएगा।
प्रकृति ने मनुष्य को जल और जंगल देकर अपना अटूट प्रेम बरसाया है। पर मानव ने अपने स्वार्थ के चलते इन्हें
नष्ट करने में कोई कोर कसर नही छोड़ी है। देखा जाए तो हमारी कई सभ्यताएं जंगलों में ही विकसित हुई है।
लेकिन वर्तमान समय में हमारे जंगल घटते जा रहे है। कोरोना काल मे जिस तरह से ऑक्सीजन की किल्लत से
जनता त्राहिमाम् त्राहिमाम कर रही थी उसे कौन भूल सकता है। इंडियन काउंसिल ऑफ फारेस्ट्र रिसर्च एंड एजुकेशन
में एक पेड़ की औसत उम्र 50 साल मानी गयी है। इन 50 सालों में एक पेड़ 23 लाख 68000 रुपये कीमत का
वायु प्रदूषण को कम करता है । साथ ही 20 लाख की कीमत का भू -क्षरण को भी नियंत्रित करता है।
अब यहां लाख टके का सवाल यही उठता है कि हीरा जरूरी है या फिर जंगल? हीरा निकालने के लिए जंगल की
कटाई कितनी सही है? यह सरकार को सोचना होगा, क्योंकि क़ीमत सिर्फ़ हीरे की नहीं उस पेड़ की भी है। जिसपर

तलवार लटकी हुई है। बुंदेलखंड का क्षेत्र पहले से ही सूखा ग्रस्त की श्रेणी में आता है। इन पेड़ों की कटाई के बाद
यह क्षेत्र ओर वीरान हो जाएगा। इन जंगलों के दुर्लभ वृक्ष के साथ ही इन जंगलों में निवास करने वाले जीव जंतुओं
का भी विनाश तय है। एक तरह से देखा जाए तो पूरी प्राकृतिक संरचना ही नष्ट होती दिखाई पड़ रही है। पर हमारे
राजनेताओं को इस बात से कहा फर्क पड़ना है। उन्हें तो सिर्फ इस वन में चमचमाते हीरो की चमक ही दिखाई दे
रही है। ऑक्सीजन की किल्लत से मरते लोग महज एक आंकड़ा थे, है और रहेंगे। जो हीरे से प्राप्त आंकड़े के
सामने शायद कुछ भी नहीं।
देखा जाए तो सदियों से मानव ने जंगलों का विनाश ही किया है। अपनी भोग विलास की लालसा को पूरा करने के
लिए मनुष्य ने जंगलों को बर्बरता से उजाड़ा है। यही सिलसिला मुसलसल अभी भी जारी रहा तो वह दिन दूर नही
जब हमारी सभ्यता ही खतरे में पड़ जाएगी। एक अनुमान के मुताविक जंगलों का दसवां भाग तो पिछले 20 सालों
में ही खत्म हो गया है। बात सिर्फ़ मध्यप्रदेश की करें तो यहां भी बीते दो-चार वर्षों में जंगल घटे ही हैं।इन जंगलों
की कटाई कभी नए नगर बसाने के नाम पर तो कभी खनन के नाम पर की जा रही है। अगर इसी तरह वनों का
विनाश जारी रहा तो वह दिन दूर नही जब इस धरती से पूरी तरह से वनों का सफाया हो जाएगा। तब न ही
अमेजन के जंगलों का रहस्य बच पाएगा और न हिमालय के जंगलों की सम्पदा बच पाएगी। ग्लोबल वॉर्मिंग की
ओर बढ़ती दुनिया में हम जिन वनों से कुछ उम्मीद लगा सकते हैं, वे तो पूरी तरह खत्म हो जाएंगे।
कोरोना काल में ऑक्सीजन की किल्लत के बीच मध्यप्रदेश के सीहोर में एक नज़ीर पेश की गयी थी। यहां सागौन
का पेड़ काटने पर एक किसान पर 1 करोड़ 21 लाख रुपए का भारी भरकम जुर्माना लगाया गया था।अब सवाल
यही उठता है कि जब वन विभाग बक्सवाहा में खुद पेड़ों को काटने के लिए गिनती कर रहा है, तो फिर दोषी किसे
माना जाएगा? इतना ही नहीं इस अव्यवस्था के "जंगलराज" का असल जिम्मेदार कौन होगा? आख़िर में सिर्फ़ क्या
सवाल इतने बड़े हीरे की खान मध्यप्रदेश के घने जंगल मे ही क्यों मिली, वह देश के बंजर भूमि में भी तो मिल
सकती थी, लेकिन मानव की परीक्षा शायद प्रकृति भी ले रही। अब यह मानव के विवेक पर निर्भर करता है। वह
क्या करेगा?

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