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कोरोना काल में भी बाघों के लौटे अच्छे दिन

-प्रो. अरविंद नाथ तिवारी-
भारत नेपाल सीमा पर स्थित बिहार के इकलौते वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना में, इस कोरोना काल में बाघों की
संख्या में आशातीत वृद्धि का समाचार प्रकाश में आया है। कोरोना काल में भी बाघों के अब अच्छे दिन लौटने लगे

हैं। बाघों की संख्या 40 तक होने की सूचना है। बाघों की संख्या में आशातीत वृद्धि होने से वन विभाग के
पदाधिकारी जहाँ प्रफुल्लित दिखाई पड़ रहें हैं, वही पर्यावरण के भी अच्छे होने के संकेत दिखाई पड़ रहें हैं।
वाल्मीकिनगर वन क्षेत्र में बाघों के रखरखाव के लिए वाल्मीकिनगर वन क्षेत्र को केंद्र सरकार ने वाल्मीकि व्याघ्र
परियोजना के रूप में 1994 ईस्वी में मंजूरी दी थी। परियोजना से लोगों को उम्मीद जगी थी कि बाघों की संख्या
में बढ़ोतरी होगी। वन विभाग के अनुसार इस परियोजना की परिधि 880 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में है, जिसमें 335
वर्ग किलोमीटर क्षेत्र राष्ट्रीय उद्यान है। 545 वर्ग किलोमीटर बाघों के रहने के लिए सुरक्षित क्षेत्र है। सन 1990 के
दशक में बाघों की संख्या यहां पर 80 थी ,जो घटकर सन 2002 में 56, सन् 2003 में 52, सन् 2005 में 40,
सन् 2007 में 18 और 2010 अप्रैल के माह तक 8 रह गई थी। सभी आंकड़ों की पुष्टि वन्य प्राणी संस्थान
देहरादून वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने भी की थी।
बाघों की गणना 13 मई और 14 मई 2010 को कैमरा के ट्रैप विधि से की गई थी। इस बीच बाघों के लिए दुर्दिन
के दिन रहें। बाघ तस्करों का कोप भाजन बनते रहे और इनकी जान जाती रही। उदाहरण स्वरूप 10 मई 2008 को
मदनपुर वन क्षेत्र के नौरंगिया कक्ष संख्या 15 में शिकारियों ने आयरन ट्रैप में एक रॉयल बंगाल टाइगर को फंसा
रखा था। इसकी भनक पहले चरवाहों को लगी। परियोजना के बाबू और अधिकारी जब वहां पहुंचे, तो बाघ जोर-जोर
से कराह रहा था, परन्तु अधिकारी ट्रैकूलर गन के अभाव में बाघ की जान नहीं बचा सके। अंततः बाघ करुण रुदन
करते हुए तड़प- तड़प कर मर गया। बाघों के मरने के समाचार पर बिहार और केन्द्र सरकार सकते में आई।
तस्करी पर लगाम लगाने के लिए 29 जुलाई 2010 को नेपाल के काठमांडू में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत
सरकार के डीआईजी फॉरेस्ट एसपी यादव और नेपाल के डायरेक्टर जनरल डिपार्टमेंट ऑफ नेशनल पार्क वाइल्ड
लाइफ कंजर्वेशन के गोपाल प्रसाद उपाध्याय ने मिलकर एक संधि पत्र पर हस्ताक्षर भी किए। तय हुआ कि दोनों
देश मिलकर बाघों की तस्करी पर लगाम लगायेंगे।
बाघों की घटती संख्या पर अपनी चिंता जाहिर करते हुए अंतरराष्ट्रीय संस्था 'ट्रैफिक' ने प्रकाशित किया, ही मारे जा
रहे हैं। दोनों देशों के पदाधिकारियों की लगातार निगरानी और सुरक्षात्मक दृष्टिकोण अपनाने से वाल्मीकि व्याघ्र
परियोजना में वर्ष 2013- 14 में बाघों की संख्या में इजाफा होना शुरू हुआ और बाघों की संख्या 28 पर जा पहुंची।
वहीं वर्ष 2018 – 19 में बाघों की संख्या लगभग 40 तक पहुंच गई। अधिकारिक गणना में बाघों में 30 व्यस्क
और 9 शावकों का अनुमान लगाया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि देहरादून स्थित वन अनुसंधान संस्थान द्वारा
प्रति 4 वर्ष पर बाघों की गणना करती है।
सन् 2018 के फरवरी मार्च में बाघों की गिनती की गई थी। बाघों की गणना वन क्षेत्र में लगे हुए कैमरों की
बदौलत की जाती है। वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना में लगभग 30 कैमरे लगाए गए हैं।हालांकि बाघों की संख्या में
बढ़ोतरी होने की आधिकारिक पुष्टि और आंकड़ा प्राप्त नहीं हो पाया है। वन संरक्षक क्षेत्र निदेशक हेमकांत राय ने
बताया कि लोगों की जागरूकता, वन प्रशासन की कड़ी चौकसी के साथ अपराध पर नियंत्रण से बाघों की संख्या में
आशातीत वृद्धि होने की संभावना है। बढ़ोतरी होने का समाचार पर्यावरण प्रेमियों के लिए एक सुखद है। फिर भी
यक्ष प्रश्न यह है कि सन् 1994 ई० तक इस परियोजना क्षेत्र में 80के संख्या में बाघ रहते थे, क्या वाल्मीकि व्याघ्र
परियोजना आनेवाले दिन में इसे पूरा कर पायेगा।
(लेखक पीयूएसटी महिला महाविद्यालय, बगहा-1(पश्चिम चम्पारण) बिहार में इतिहास के विभागाध्यक्ष हैं)

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