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कौन सुधार सकता है भारत-चीन संबंधों को

-आर.के. सिन्हा-
जब सारा संसार वैश्विक महामारी कोरोना से जूझ रहा है, तब भारत को चीन के आक्रामक रवैये का भी अलग से
सामना करना पड़ रहा है। कहना न होगा कि इससे भारत की कठिनाइयां तो बढ़ी ही हैं। चीनी सेनाएं भारत की
सीमाओं पर लगातार अतिक्रमण करने से लेकर वहां अपनी तैनाती को बढ़ाती रही हैं। सारी दुनिया चीन के नापाक
इरादों को देख रही है। इसलिए रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने विगत शनिवार को एक तरह से संकेतों में
कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग दोनों ''जिम्मेदार नेता'' हैं, जो दोनों देशों के
बीच मुद्दों का आपसी बातचीत कर समाधान करने में सक्षम हैं। पुतिन ने जो कुछ कहा है उसे गहराई से समझना
होगा। उनकी और विश्व के किसी भी जिम्मेदार राष्ट्राध्यक्ष की यही चाहत होगी कि एशिया की दोनों महाशक्तियों
के बीच शिखर स्तर पर वार्ता जल्द प्रारम्भ हो जाए। जब वार्ता चालू होगी और दोनों देशों के प्रतिनिधि एक-दूसरे
के आमने-सामने बैठेंगे ठोस नतीजे सामने आ ही जाएंगे।
भारत-चीन संबंधों पर पैनी नजर रखने वाले विशेषज्ञ जानते हैं कि अगर चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग दिल से चाहें
तो भारत-चीन संबंध मधुर हो सकते हैं। वे आज के युग के चीन के एकछत्र नेता हैं। पर वे सीमा पर तनाव और
झड़प के बावजूद चुप रहते हैं। उन्हें देखा जाए तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से सीधे बातचीत करनी चाहिए ताकि
विवादित मसलों को तत्काल सुलझाया जा सके। अब जरा देखिए जब सारी दुनिया एक-दूसरे से सीधे फोन पर
संवाद कर रही है तब वे कोरोना के कहर के बीच मोदी जी को चिट्ठी लिखते हैं। अपनी चिट्ठी में उन्होंने कोरोना
वायरस महामारी पर संवेदना व्यक्त की और इसके खिलाफ लड़ाई में मदद का प्रस्ताव दिया। शी चिनफिंग ने अपने
संदेश में कहा कि चीन भारत के साथ महामारी रोधी सहयोग मजबूत करने और देश को समर्थन और सहायता

प्रदान करने के लिए तैयार है। क्या वे मोदी जी से सीधे बात नहीं कर सकते थे जिससे रिश्तों में छाई बर्फ पिगल
पाती?
मोदी जी से शी चिनफिंग मिलते रहे हैं। वे साल 2019 के अंत में चेन्नई के प्राचीन शहर मामल्लापुरम आए थे,
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अनौपचारिक शिखर वार्ता के लिए। तब मोदी-शी चिनफिंग के बीच चर्चा के बाद लगा
था कि अब दोनों देशों के बीच सहयोग का नया युग शुरू होगा। दोनों नेताओं ने छह घंटे से अधिक समय तक
आमने-सामने बातचीत के बाद मतभेदों को विवेकपूर्ण ढंग से सुलझाने का संकल्प जताया था।दोनों देशों ने
कारोबार,निवेश और सेवा क्षेत्र से जुड़े विषयों पर एक नया तंत्र स्थापित करने पर सहमति व्यक्त की थी। तब चीनी
राष्ट्रपति ने दोनों देशों के बीच व्यापार असंतुलन पर कदम उठाने का भरोसा दिया था।
दरअसल भारत की चिंता थी कि दोनों देशों के आपसी व्यापार में चीन भारी लाभ की स्थिति में है। वह भारत से
आयात की तुलना में कहीं अधिक भारत को निर्यात करता है। पर इसके बाद दोनों देशों के बीच संबंध सुधरने के
बजाय खराब ही होते गए। इसके लिए चीन पूरी तरह से जिम्मेदार रहा। पहले डोकलाम और फिर लद्दाख में दोनों
देशों के सैनिकों के बीच तेज झड़पें भी हुईं। दोनों ओर से अनेकों जानें भी गईं I ध्यान रहे कि द्विपक्षीय संबंधों में
तनाव का कारण सीमा विवाद ही रहता है। इसलिए नेहरू काल से लंबित सीमा विवाद का हल करना जरूरी है।
भारत मानता है कि चीन सीमा विवाद को दूर करके व्यवहारिक सहयोग को बढ़ावा देने का काम कर सकता है।
हालांकि डोकलाम तथा लद्दाख की घटनाओं ने दोनों देशों के संबंधों को गंभीर रूप से प्रभावित किया।
चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग को अपने देश की घनघोर विस्तारवादी नीति को छोड़ना होगा। उन्हें डोकलाम और
लद्दाख की झड़प के बाद यह पता तो चल ही गया होगा कि अब भारत 1962 वाला भारत तो कतई नहीं रहा।
यदि युद्ध की नौबत आई तो भारतीय फौजें बीजिंग में घुस जाने को तैयार बैठी है। भारत के लाखों वर्ग किलोमीटर
के हिस्से को कब्जा कर बैठा चीन भारत से लगती वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर फिर भी अतिक्रमण करने
से बाज नहीं आता। दोनों देशों के बीच 4048 किलोमीटर में फैली लम्बी सीमा हैं। इसमें वेस्टर्न सेक्टर (लद्दाख),
मिडिल सेक्टर (उत्तराखंड, हिमाचल) और ईस्टर्न सेक्टर (सिक्किम,अरुणाचल) शामिल हैं। अब भारत चीन से
रणभूमि और कूटनीति दोनों स्तरों पर दो-दो हाथ करने से पीछे हटने वाला नहीं है।
चीन जान ले कि यह पंडित नेहरू के दौर का भारत नहीं है। नेहरू जी के नेतृत्व में चीन ने भारत को युद्ध में
भारी क्षति पहुंचाई थी। भारत के बड़े भू-भाग को कब्जा लिया था। भारत चीन से बराबरी के संबंध चाहता है। भारत
की चाहत है कि भारत-चीन आपसी व्यापारिक संबंध और बढ़े। यही दोनों देशों के हित में भी हैI भारत चीनी
निवेशकों को अपने यहां निवेश करने के तमाम अवसर देता है। अगर बात दिल्ली, गुरुग्राम और नोएडा की करें तो
इनमें हजारों चीनी नागरिक सम्मानपूर्वक रहते हैं। ये हुआवेई, ओप्पो मोबाइल, मित्तु, बेडु जैसी कंपनियों से जुड़े हैं।
हुआवेई में शायद सबसे अधिक चीनी पेशेवर हैं। इनमें महिलाओं की संख्या भी अच्छी-खासी है। अकेले गुरुग्राम में
लगभग चार हजार से ज्यादा चीनी नागरिक विभिन्न कंपनियों में काम कर रहे हैं। इनमें से लगभग आधे चीनी
नूतन वर्ष मनाने पिछली जनवरी में अपने देश में गए भी थे। पर कोरोना के फैलने के कारण वहीं फंस गए। ये
वहां से भारत आने की भरसक कोशिश भी कर रहे हैं। जो भारत में बचे हैं, वे तो यहां से किसी भी सूरत में
निकलने को तैयार नहीं है। उन्हें भारत ज्यादा सुरक्षित नजर आ रहा है।
चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग सितंबर, 2015 में नई दिल्ली भारत आए थे। तब चीनी एंबेसी ने भारत में करीब
100 सालों से बसे हुए चीनी मूल के भारतीय नागरिकों और यहां काम करने वाले चीनी पेशेवरों को आमंत्रित किया
था। उस मिलबैठ में चीनी राष्ट्रपति ने सबका आह्वान किया था कि वे भारत के विकास में भागीदर बनें। पर उनके
नेतृत्व वाले चीन ने भारत से संबंधों को गति देने की कोशिश ही नहीं की। उन्होंने तो अपने देश की कंपनियों के
हितों की भी परवाह नहीं की।

कोरोना काल से पहले राजधानी के शांतिपथ स्थित एंबेसी में खासी रौनक रहती थी। हजारों लोग व चीन जाने वाले
व्यापारी वीजा के लिए आए होते थे। पर अब वहां भी उदासी और सूनापन छाया हुआ है। इधर सामान्य दिनों में भी
बहुत लोग अंदर-बाहर आते-जाते दिखाई नहीं देते थे। सन 1960 के शुरू में बन गई चीनी एंबेसी 12 मार्च, 2020
से लगभग बंद पड़ी है। इसके बाहर दिल्ली पुलिस के जवान हमेशा तैनात रहते हैं। यहाँ फिर पहले वाली चहल-पहल
लौट सकती है यदि शी चिनफिंग चाहें तो।

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