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दिल्ली मे मृत्यु दर देश के मुकाबले 5 गुणा ज्यादा : आदेश गुप्ता

नई दिल्ली, 31 मई (एजेंसी)।
हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और, मुहावरा मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर
सटीक बैठता है, क्योंकि ये भी ऐसे ही हैं, कहते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं। वर्ल्ड क्लास स्वास्थ्य
सुविधाओं का हवाला देते-देते केजरीवाल सरकार ने दिल्ली को कोरोना से मृत्यु दर प्रति 10 लाख की सूची में बाकी
राज्यों से सबसे ऊपर लाकर खड़ा कर दिया। केजरीवाल सरकार ने कोरोना से हुए मौत के आंकड़ों को लगातार
छुपाया है। टीकाकरण हो, टेस्टिंग हो या ट्रीटमेंट, सभी में दिल्ली सरकार फेल रही है। यही नहीं केजरीवाल सरकार
कोरोना योद्धाओं के मृत्यु पर भी भेदभाव तरीके से मुआवजा दे रही है। दिल्ली में सैकड़ों कोरोना योद्धाओं ने
अपनी प्राणों की आहुति दी, लेकिन केजरीवाल सरकार उनके परिजनों को मदद करने और सहायता पहुँचाने में
भेदभाव कर रही है।

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प्रदेश कार्यालय में आज दिल्ली भाजपा अध्यक्ष आदेश गुप्ता, नेता प्रतिपक्ष रामवीर सिंह बिधूड़ी और सांसद रमेश
बिधूड़ी ने केजरीवाल सरकार द्वारा जानबूझकर कर कोरोना से मरने वालों के आंकड़ों को लेकर की जा रही हेर-फेर
और चालबाजी का पर्दाफाश करने के लिए संयुक्त प्रेसवार्ता को संबोधित किया। इस अवसर पर प्रदेश प्रवक्ता सूनीतू
डबास उपस्थित रहीं।

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दिल्ली भाजपा अध्यक्ष आदेश गुप्ता ने कहा कि कोरोना महामारी की दूसरी लहर के कारण दिल्लीवासी जब समय
पर चिकित्सा सुविधा न मिलने पर दम तोड़ रहे थे तब केजरीवाल और उनकी पूरी टीम इन हालातों को नियंत्रित
करने के लिए कार्य करने की बजाय इस जद्दोजहद में लगी थी कि इन बिगड़ते हालातों की जिम्मेदारी किसके सिर
थोपी जाए या सवालों से बचने के लिए क्या-क्या हथकंडे अपनाए जा सकते हैं। जिसका दुखद परिणाम रहा कि
अन्य राज्यों के मुकाबले दिल्ली में कोरोना से मृत्यु दर प्रति 10 लाख की आबादी पर सबसे अधिक दर्ज की गई।
वर्ल्ड मीटर की रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में मृत्यु दर प्रति 10 लाख विश्व में 455 और भारत में 234 है, वहीं 30
मई, 2021 तक के आंकड़ों को देखें तो दिल्ली में 1207 है। 30 मई की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में कोविड केस
फैटलिटी रेट 1.69 प्रतिशत है, जबकि ओडिशा में 0.35 प्रतिशत, केरल में 0.33 प्रतिशत, तो वहीं बिहार में 0.13
प्रतिशत कोविड केस फैटलिटी रेट है। 30 मई को जारी हेल्थ बुलेटिन के अनुसार अब तक दिल्ली में 24,151 मौत
हो चुकी हैं। आखिर दिल्ली में सबसे ज्यादा मौतों की जबाबदेही सिर्फ केजरीवाल सरकार की बनती है।
गुप्ता ने कहा कि दिल्ली नगर निगम के मुताबिक अप्रैल के आखिरी सप्ताह में एक दिन में 700 से ज्यादा लोगों
का नगर निगम के अलग-अलग क्रीमेशन ग्राउंड और कब्रिस्तानओं के अंदर अंतिम संस्कार किया गया, लेकिन
दिल्ली सरकार के आंकड़ों के मुताबिक एक दिन में दिल्ली में अधिकतम मौत 450 से ज्यादा नहीं हुईं। आंकड़े
बताते हैं कि 1 अप्रैल से 17 मई के बीच दिल्ली के तीनों नगर निगमों में स्थित शमशान और कब्रिस्तान में
16,593 शव का अंतिम संस्कार कोरोना विधि से हुआ है, जबकि इस दौरान केजरीवाल सरकार ने मात्र 11,061
मौत के आंकड़े जारी किए। जिसका साफ मतलब है कि केजरीवाल सरकार द्वारा जारी आंकड़ों से ज्यादा 5532 मृत
लोगों का अंतिम संस्कार कोरोना विधि से दिल्ली नगर निगम के श्मशान और कब्रिस्तानों में किया गया है। मौत
के आंकड़ों को छिपा कर झूठी वाहवाही बटोरने की लालसा में केजरीवाल सरकार ने संवेदनहीनता की पराकाष्ठा को
पार दिया। अपने इस घृणित कार्य के लिए मुख्यमंत्री केजरीवाल को दिल्लीवासियों से माफी मांगनी चाहिए।
नेता प्रतिपक्ष रामवीर सिंह बिधूड़ी ने कहा कि मृत्यु पर ओछी राजनीति करना केजरीवाल सरकार के लिए सामान्य
बात हो गई है। मुख्यमंत्री ने कोरोना के कारण अपनी जान गंवाने वाले कोरोना योद्धाओं के साथ भी भेदभाव
किया। वर्तमान में 500 से ज्यादा कोरोना योद्धा हैं, लेकिन केजरीवाल सरकार ने अभी तक लगभग एक दर्जन
लोगों को ही कोरोना योद्धा के रूप में सम्मानित किया है और उनके परिजनों को मुआवजा राशि प्रदान की और
अन्य को कोरोना योद्धा मानने से भी इनकार कर दिया। केजरीवाल सरकार ने शुरू में डॉक्टर, नर्स, लैब
टेक्नीशियन, पैरा मेडिकल स्टाफ और अस्पतालों का अन्य स्टाफ व सफाई कर्मचारी जोकि कोरोना ड्यूटी पर हो, को
ही कोरोना योद्धा माना था, लेकिन बाद में इस सूची में दिल्ली पुलिस, सिविल डिफेंस, प्रिंसिपल और शिक्षकों को
भी शामिल कर लिया गया। लेकिन बेहद ही दुख की बात है कि मुख्यमंत्री केजरीवाल आम आदमी पार्टी के नेताओं
और विधायकों की पैरवी पर कुछ लोगों को ही कोरोना योद्धा चुनकर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं।

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उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री जहां दिल्ली पुलिस के 58 कोरोना योद्धाओं की शहादत पर मौन धारण किये बैठे हैं वही
मोदी सरकार ने अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए कोरोना के कारण माता-पिता या अभिभावक दोनों को
खोने वाले सभी बच्चों को “पीएम-केयर्स फॉर चिल्ड्रन“ योजना के तहत 18 साल की उम्र में मासिक वजीफा
(stipend) और 23 साल की उम्र में पीएम केयर्स से 10 लाख रुपये का फंड देने की घोषणा की है, 10 वर्ष तक के
बच्चे को निकटतम केंद्रीय विद्यालय या एक निजी स्कूल में डे स्कॉलर के रूप में प्रवेश दिया जाएगा। 11-18 वर्ष
के बच्चे को केंद्र सरकार के किसी भी आवासीय विद्यालय जैसे सैनिक स्कूल, नवोदय विद्यालय में प्रवेश दिया
जाएगा। वहीं मुख्यमंत्री केजरीवाल अपनी जिम्मेदारियों से बचने का अवसर ढूंढ़ रहे हैं। जिन परिवारों ने अपनों को

खोया है उसकी जिम्मेदार केजरीवाल सरकार की है, इसलिए वह सुनिश्चित करें की मृतकों के परिजनों को भविष्य
में कोई आर्थिक समस्या न हो। हम यह मांग करते हैं कि केजरीवाल सरकार मृतकों के परिजनों को मिलने वाली
मुआवजा राशि 10 लाख रुपए करें और परिवार को 10,000 रुपए प्रति माह पेंशन देने का प्रावधान करें।
अभिभावकों को खोने पर जो बच्चे स्कूल या कॉलेज में हैं उनका भविष्य दांव पर लगा है, इसलिए उनकी फीस का
इंतजाम करने की जिम्मेदारी भी केजरीवाल सरकार उठाएं।
सांसद रमेश बिधूड़ी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा आगाह करने के बावजूद भी केजरीवाल सरकार ने
कोई ध्यान नहीं दिया और स्थिति बिगड़ती चली गई। केजरीवाल सरकार का कोरोना को लेकर लापरवाही का
नतीजा है कि दिल्ली में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 24 हजार मौत हुई है जबकि हकीकत यह है कि 35 से 36
हजार लोगों ने कोरोना से अपनी जान गवाई है। 30 मई को सरकारी आंकड़ा बताता है कि 23 मार्च तक डेथ रेट
2.54ः थी जो कि बाकी राज्यों की तुलना में काफी अधिक है। अपनी सोच विभाग को वर्ल्ड क्लास बताने वाले
केजरीवाल साल 2015 के मेनिफेस्टो में यह कहा था कि प्रत्येक 1000 व्यक्ति के बीच में 5 बेड की व्यवस्था की
जाएगी लेकिन वह वादा सिर्फ जुमला साबित हुआ। यही नहीं साल 2019 में दिल्ली सरकार के इकोनामिक सर्वे ने
एक आंकड़ा दिया जिसमें यह कहा गया कि साल 2014 में दिल्ली में कुल अस्पताल 95 थे लेकिन साल 2019
आते-आते इनकी संख्या 88 हो गई। जबकि दिल्ली में प्रत्येक साल 5 लाख की जनसंख्या बढ़ती है चाहे वह
नवजात शिशु हो या फिर प्रवासी मजदूर जो दूसरे राज्यों से नौकरी और रोजगार की तलाश में दिल्ली आते हैं।
उन्होंने कहा कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार की लापरवाही का सबसे बड़ा सबूत साल 2013-14 में शुरू की गई
अस्पतालों का अभी तक निर्माणाधीन होना है। अम्बेडकर नगर में 600 बेड का अस्पताल जो साल 2013-14 में
राष्ट्रपति शासन लागू हुआ था उस वक्त निर्माण कार्य शुरू किया गया जो आज भी निर्माणाधीन हैं। इंदिरा गांधी
अस्पताल द्वारका में जिसमें लगभग 1725 बेड हैं साल 2018 से ही बनकर तैयार है लेकिन इतनी बड़ी आपदा
आने के बाद और जब हाई कोर्ट ने फटकार लगाई तब जाकर सिर्फ 100 बेड शुरू करने का आदेश केजरीवाल
सरकार द्वारा दिया गया। बुराड़ी स्थित 768 बेड का अस्पताल को अभी तक शुरू नहीं किया गया है। बिधूड़ी ने
आरोप लगाया कि साल 2013-14 में दिल्ली का बजट 39000 करोड़ होने पर 12.11ः स्वास्थ्य पर खर्च होता था,
लेकिन 2021-22 में दिल्ली का बजट बढ़कर 69000 करोड़ जरूर हो गया मगर हेल्थ पर मात्र 11.64ः पैसे खर्च
करने की बात सरकार द्वारा कही गई। आखिर इतना बड़ा धोखा दिल्ली की जनता के साथ क्यों किया गया? बाकी
पैसे कहां खर्च किए जा रहे हैं इसका जवाब केजरीवाल सरकार को जरूर देना चाहिए। प्रचार और विज्ञापन की
दुनिया से अभी तक केजरीवाल सरकार नहीं उबर पाई है।
दिल्ली भाजपा ने केजरीवाल सरकार से पूछे पांच सवाल
1. विश्व में मृत्यु दर प्रति 10 लाख 455 है और भारत में 234 है, वहीं दिल्ली में 1207 क्यों है, दिल्ली में सबसे
अधिक मृत्यु दर का जिम्मेदार कौन है?
2. केजरीवाल सरकार ने कोरोना से हुई मौत के आंकड़ों को कम करने की राजनीति क्यों की, जबाव दो?
4. मृतक कोरोना योद्धाओं के साथ भी भेदभावपूर्ण राजनीति क्यों कर रही है केजरीवाल सरकार ? जबाव दो?

4. कोरोना से मरने वाले लोगों के परिजनों मुआवजा इतना कम क्यों, उचित मुआवजा, पेंशन और बच्चों के स्कूल
एवं कॉलेज की फीस की जिम्मेदारी की घोषणा कब करेगी दिल्ली सरकार?
5. केजरीवाल के शासनकाल में 44,262 करोड़ रुपए स्वास्थ्य पर खर्च करने के बाद भी स्वास्थ्य व्यव्स्था लचर
हालत में क्यों है? कोरोना की पहली लहर के बाद दूसरी लहर से पहले स्वास्थ्य व्यव्स्था ठीक क्यों नहीं किया?

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