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फूल, पत्थर और सिस्टम

-पी. के. खुराना-
समय के साथ-साथ देश बदल गया है, लोगों की सोच बदल गई है, व्यवसाय का तरीका बदल गया है और मीडिया
भी बदल गया है। सोशल मीडिया ने हमारे जीने का तरीका ही बदल दिया है। इन बड़े परिवर्तनों के बावजूद न तो
देश की राजनीति बदली है, न राजनीतिज्ञों की सोच। सत्ता में जो भी होता है वह हर हाल में पूरी शक्ति अपने ही
हाथ में रखना चाहता है। गड़बड़ यह है कि हर राजनेता यह तो चाहता है कि शक्तियां उसके पास हों, अधिकार
उसके पास हों, पर कोई राजनेता यह नहीं चाहता कि उससे कोई पूछताछ भी हो, उसकी कोई जवाबदारी भी हो।
समस्या यह है कि हमारे संविधान में राजनेताओं की जवाबदेही का कोई प्रावधान है ही नहीं। इसी तरह शासन-
प्रशासन में जनता की भागीदारी का भी कोई प्रावधान नहीं है। चुनाव आते हैं, हम वोट देते हैं और खुद को बादशाह
मान लेते हैं, लेकिन चुनाव के बाद हमारी कोई न पूछ है और न औकात। अरविंद केजरीवाल जब पहली बार
मुख्यमंत्री बने थे तो वे न केवल कल्पनाशक्ति के धनी थे बल्कि एक्टीविस्ट रह चुकने की अपनी पृष्ठभूमि के
कारण समस्याओं के हल की ओर ज्यादा ध्यान देते थे, नए ढंग से सोचते थे और जनहित के अनूठे काम करते थे।
तब उन्होंने डीटीसी की खराब पड़ी बसों से सीटें हटवा कर उन्हें रैन बसेरों में बदल दिया था।
ये वो ज़माना था जब उन्होंने दिल्ली में बिजली सप्लाई करने वाली बड़ी प्राइवेट कंपनियों को उनकी औकात दिखा
दी, रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के खिलाफ कार्यवाही का इरादा किया और सेहत व्यवस्था बेहतर करने के लिए मोहल्ला
क्लीनिक तथा स्कूलों में दी जाने वाली शिक्षा का स्तर सुधारने के प्रयास आरंभ किए। अरविंद केजरीवाल का पतन
तब शुरू हुआ जब उन्होंने प्रधानमंत्री बनने की जल्दी में सभी सीमाएं तोड़नी शुरू कर दीं। मुख्यमंत्रित्व काल के
अपने दूसरे दौर की शुरुआत में भी वे वही गलती करते रहे और विधानसभा चुनावों में 67 सीटों पर जीत का बड़ा
कीर्तिमान स्थापित करने के बावजूद दिल्ली नगर निगम चुनावों में धूल चाटते रह गए। केजरीवाल अब कुछ संभले
हैं, पर उनकी महत्त्वाकांक्षाएं अब भी उनसे ऐसे काम करवा लेती हैं जिनका जनहित से कुछ भी लेना-देना नहीं है।
नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो हर रोज़ एक नया नारा और नई योजना देने लगे। बाद में अगर सर्जिकल स्ट्राइक का
सहारा न लिया होता और विपक्ष एकदम ही नकारा न हो गया होता तो 2019 के लोकसभा चुनावों में उन्हें वैसा
समर्थन न मिलता जो मिल गया। मोदी ने मीडिया की जोर-जबरदस्ती खत्म की, लुटियंस कहे जाने वाले
सुविधाभोगी बुद्धिजीवियों की परवाह छोड़ी, कश्मीर समस्या का ऐसा हल ढूंढ़ा जो किसी की कल्पना में नहीं था।
मोदी भी कल्पना के धनी हैं और तेजी से काम करने वाले नेता हैं। वे जि़द्दी हैं और धुन के पक्के हैं। मोदी जानते
थे कि लोकसभा में भारी बहुमत के बावजूद अगर राज्यसभा में बहुमत न हो और राज्यों में उनके दल की सरकार
न हो तो उनके हाथ बंधे ही रहेंगे, इसलिए सारी आलोचनाएं सहते हुए भी उन्होंने राज्यों के चुनाव में प्रचार की
बागडोर खुद संभाली और ज्यादातर राज्यों में अपनी सरकार के गठन में सफल हुए। जहां वोट नहीं मिले या कम
मिले, वहां समझौते कर लिए, जोड़-तोड़ कर ली, नैतिक और अनैतिक की परवाह किए बिना सिर्फ लक्ष्य को देखा।
हम राजनेताओं की निंदा करें या प्रशंसा, एक बात समझने में हम सब असमर्थ हैं कि हमारा पूरा सिस्टम इतना
विकृत है कि सिस्टम ही भ्रष्टाचार का जनक भी है और पोषक भी। अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा चुनावों
में 70 में से 67 सीटें जीतीं। जनमत उनके साथ था।
लेकिन प्रधानमंत्री की शह पर एक अकेले उपराज्यपाल ने उन्हें घुटनों पर ला दिया। पूरे देश में यही हाल है। आप
मेयर चुनते हैं, लेकिन एक म्युनिसिपल कमिश्नर के पद पर बैठे एक आईएएस अधिकारी के सामने मेयर मक्खी-

मच्छर जैसा ही है। कारण यह है कि हम मतदाताओं को ये ही मालूम नहीं है कि हम अपना जनप्रतिनिधि
किसलिए चुनते हैं और उसमें क्या योग्यता होनी चाहिए। हम भारतीय इसी बात से गाफिल हैं कि हमारा सिस्टम
कैसा होना चाहिए और वैसा ही क्यों होना चाहिए? यह समझना आवश्यक है कि हम लोकसभा के सांसद से उस
काम की उम्मीद करते हैं जो पार्षद का है, हम अपने विधायक से भी यही उम्मीद करते हैं, यहां तक कि पूरे विश्व
में केवल हमारे संविधान में ही यह प्रावधान है कि सांसद निधि से सांसद अपने क्षेत्र में विकास के काम करवाए।
सिस्टम यह होना चाहिए कि क्षेत्र के रोज़मर्रा के काम पार्षद और मेयर करवाएं और उनके पास वे अधिकार हों कि
इन कामों के लिए वे किसी म्युनिसिपल कमिश्नर के मोहताज न हों। शहर के विकास की नीति का निर्धारण मेयर
करे न कि म्युनिसिपल कमिश्नर। इसके लिए यह भी आवश्यक है कि मेयर को सरकारी कामकाज के तरीकों का
पता हो, कानून की समझ हो और लोगों का समर्थन हो। विधायक का काम राज्य विधानसभा में ऐसे कानून
बनवाना है जिससे क्षेत्र का विकास हो सके, उद्योग पनप सकें, कृषि फल-फूल सके, शिक्षा उपयोगी बन सके। यही
काम सांसद अपने राज्य के लिए करे। अभी तो पार्षद, विधायक और सांसद की जिम्मेदारियां ही ठीक से परिभाषित
नहीं हैं, इसीलिए सब कुछ गड्डमड्ड है।
हम किसी की निंदा करें या प्रशंसा, यह तब तक थोथी है जब तक हम यह न समझें कि सिस्टम बहुत
शक्तिशाली होता है, एक अकेला आदमी पूरे सिस्टम का हमेशा मुकाबला नहीं कर पाता और उसे बहुत से समझौते
करने पड़ते हैं। आज स्थिति यह है कि हमारा सिस्टम ही गलत है और सिस्टम ही हमारे राजनेताओं को भ्रष्ट होने
के लिए विवश कर रहा है। अपने लालच पूरे करने के लिए और सारी शक्तियां सारी उम्र अपने ही पास रखने की
नीयत से राजनेताओं ने इस सिस्टम को बेतरह तोड़ा-मरोड़ा है और आज यह सिस्टम एकदम नकारा हो गया है।
इसे बदले बिना कोई स्थायी सुधार संभव नहीं है। सिस्टम में संतुलन आवश्यक है और वह संतुलन यह है कि चुने
हुए जनप्रतिनिधियों के पास समुचित शक्तियां हों, अधिकार हों लेकिन उन पर अंकुश भी हों, उनकी जवाबदेही भी
तय हो और जवाबदेही की प्रक्रिया स्थापित हो। उसके लिए स्थानीय स्वशासन मजबूत हो, आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो
और नेताओं की उन्नति का कारण किसी पार्टी का हाईकमान न हो, बल्कि जनता हो। जब जनता के समर्थन से
कोई नेता आगे बढ़ेगा तो वह जनहित की बात सोचेगा, उसे तब हाईकमान की चापलूसी की चिंता नहीं होगी, चुनाव
लड़ने के लिए पार्टी का टिकट मिलने या कट जाने की चिंता नहीं होगी और वह जनता से जुड़ा रहने के लिए विवश
हो। शुरुआत स्थानीय स्वशासन से हो। इस प्रयोग का अनुभव हो जाए, हमें इसकी प्रभावशीलता की तसल्ली हो
जाए तो इसे राज्य स्तर पर और फिर राष्ट्र के स्तर पर लागू किया जाए। इसी में लोकतंत्र की मजबूती है और देश
की भलाई है।

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