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लोहे के बैल से हांकता देश

-एसआर हरनोट-
यह मौसम खरीफ की फसल बवाई का है। दूसरा मौसम कोरोना-समय के दूसरे वर्ष के पूर्ण लॉकडाउन का भी।
तकरीबन सभी नौकरी-पेशा लोग गांव में हैं और मक्की-दालें बीज रहे हैं। गांव में मेरा घर जिस जगह पर है, उसके
चारों तरफ खेत ही खेत हैं। बवाई दो तरह के बैलों से हो रही है। असली और नकली बैलों से। नकली का मतलब
‘लोहे का बैल’ से है। अर्थात डीजल से चलने वाला छोटा ट्रैक्टर। अब अधिकतर किसान इसी नकली बैल से असली
खेती-बवाई कर रहे हैं। इसका शोर भयंकर कानफोड़ू होता है, उतना ही जैसा फटफटे यानी मोटरसाइकिल का, जो
दूर-दूर तक सुनाई देता है। दो-चार खेतों में जब ये चल रहे होते हैं तो भीतर-बाहर बैठना मुश्किल हो जाता है।
आपको इसकी बदहवास सी चीखों के बीच न तो हवा की सरसराहटें सुनाई देंगी और न ही खेतों की बीड़-सीत में
उगे पेड़ों-झाडि़यों के बीच बैठी चिडि़या की मीठी-मीटी चहचाहटें। गांव के घरों से लेकर खेत-खलिहान और वृक्ष डरे-
सहमे से लगते हैं…मानो फसल की बवाई न होकर कोई घोर-युद्ध चल रहा हो। किसी बिरले खेत में असली बैलों की
एक-आध जोड़ी अब मुश्किल से नज़र आती है। आती भी है तो इस लोहे के बैल के शोर के आगे वे भी उदास-
निराश से लगते हैं जैसे उनकी सलतनत किसी ने छीन ली हो। उनके गले में बंधी घंटियां बेजान सी स्वरहीन ऐसे
लटकी दिखती हैं जैसे वे भागने को आतुर हो। एक ज़माना था जब फसलों की बवाई के वक़्त गौशालाओं से बैल
अपार मस्ती और ऊर्जा से निकलते थे।
उनके गले की घंटियां यह बता रही होतीं कि खेतों में बाच हो गई है यानी वर्षा से खेतों में नमी है। उनके पीछे-
पीछे चलते किसानों के कंधों पर हल-जुंगड़ा एक अलग नजारा पेश करता था। बैलों के लिए किसानों की झाड़ें,
घंटियों के स्वर, वृक्षों के झुरमुटों में लोकगीत गाती भांति-भांति की चिडि़याएं ऐसा समां बांधती जिसको शब्दों में
बांधना आसान नहीं है। खेतों में हल जुतता तो उसका फाला और बैलों के खुरों के मधुर संगीत में मिट्टी जैसे हर्ष
से नाचने लगती। आज गांव-गौशालाओं से बैल क्या गए, जैसे सावन-भादो ही चले गए। आधुनिक होते गांव और
अपनी माटी से कटते लोगों की वजह से खेत-खलिहान और पगडंडियां जैसे सूनी हो गईं। अकेली-पखली हो गई। पशु
पालने की जो संस्कृति गांव का मूल आधार होता था, वह चला गया। लोगों ने शहरों और नौकरियों की तरफ रुख
कर लिया। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई शहरों में होने लगी। जिन खेतों में कभी मौसमी फसलें लहराती थीं, अधिकतर वे
उजाड़ हो गए। गांव की अति वरिष्ठ पीढ़ी जिसने ये सब सहेज कर रखा था अपने कलेजे पर पत्थर रख कर, यह
सब देखती रही। कारण कई हो सकते हैं। बहुत से गिनाए जा सकते हैं। मुख्य कारण यही रहा कि नई पीढ़ी का
लगाव और रुझान अच्छी पढ़ाई और नौकरी की तरफ होता चला गया। दूसरा कारण हमारी सरकारों की कई स्तरों
पर नाकामियां रहीं। न गांव में वे बेहतर व रोजगार-युक्त शिक्षा दे पाईं और न ही आधुनिक कृषि की गांव के
हिसाब से कोई तकनीकें ही विकसित हुईं। न ही सिंचाई के पर्याप्त साधन ही जुट पाए। पीछे छूटे लोगों-किसानों ने
यदि कृषि करनी भी चाही तो बंदरों, सुअरों, भालुओं और अनेक जंगली जानवरों और पक्षियों के हमलों से वे उसे
बचा न पाए। ऐसे बहुत से कारण रहे जिसने पारंपरिक कृषि को समाप्त कर दिया और लोग केवल और केवल
सरकारी डिपुओं और राशन के इंतजार में दिन व्यतीत करने लगे। कृषि पर जो आत्मनिर्भरता थी, वह आधुनिकता
और सरकारी नाकामियों की भेंट चढ़ गई।
आज ऐसा नहीं है कि लोग खेती-कृषि करते नहीं। परंतु वह पहले जैसा जुनून अब देखने को नहीं मिलता। लोगों ने
आसान तरीका और रास्ता निकाला। न पशु-बैल पालने का झंझट न उनकी देख-भाल की चिंता। बस थोड़ा पैसा
खर्चो और एक ‘लोहे का बैल’ ले आओ। मेरी एक कहानी ‘लोहे का बैल’ वर्ष 2013 में जनसत्ता के वार्षिक अंक में

छपी थी। यह शायद उससे दो-तीन वर्ष पहले लिखी थी जब गांव में किसी को लोहे के ट्रैक्टर का पता नहीं था।
बात अपने गांव-परगने की कर रहा हूं। इस लोहे के बैल की परिकल्पना मेरे अपने घर से ही शुरू हुई और भविष्य
की संभावनाएं इस कहानी में दर्ज हो गइर्ं। जब पिता और मां नहीं रहे तो घर में ताले लग गए। मेरे पास काफी
कृषि-भूमि है जो बहुत सी उजाड़ पड़ गई। पहले गांव के किसी परिवार से बैल लेकर उसे बाह-जोत लिया जाता था,
परंतु जब गांव से बैल नदारद हुए तो वह आस भी जाती रही। फिर एक-आध जोड़ी किसी के पास रही भी तो वे
उनके अपने लिए ही होती, दूसरे के लिए तो देने की सोच भी न सकते। इसी ने इस कहानी ‘लोहे के बैल’ को
लिखवाया और खूब चर्चित भी हुई। हैरानी तब हुई जब उस कहानी के छपने के दो साल बाद यह ‘लोहे का बैल’
सबसे पहले मेरे ही घर चला आया। बेटे की इच्छा थी कि खरीद लिया जाए। हमने सोलन की एक कंपनी से सबसे
महंगे वाला यह कृषि-ट्रैक्टर खरीद लिया। मेरे गांव में इससे पहले इसका प्रवेश नहीं हुआ था। दो-चार सालों के बाद
हर तीसरे किसान ने इसे ले लिया और आज खेतों में बैलों की जगह फसलों की बवाई पर ये बदहवास से भागे रहते
हैं जिसने खेती की सारी मिठास छीन ली।
दूसरी तरह से सोचें तो असली-नकली का यही खेल पूरे देश और दुनिया में चल रहा है। देश जैसे इन्हीं लोहे के
बैलों से हांका जा रहा हो। सड़क से संसद तक, घर से बाजार तक अब बोलबाला इसी ‘बैल’ का ही है। असली तो
अब ‘ऑरगेनिक‘ के नाम से बिक रहा है। मनुष्य भी असली कहां रहे हैं अब। वे भी ‘लोहे के बैलों’ में परिवर्तित हो
गए हैं। वहां भी यही दोगलापन है। यही असली-नकली की परख के साथ उन्हें जगह-जगह उपस्थित किया जाता है।
प्रिंट मीडिया से लेकर इलैक्ट्रानिक मीडिया। इसी की आड़ में कई शब्द इजाद कर लिए गए हैं। जैसे देशद्रोही, देश
विरोधी, गोदी और असली मीडिया, बुद्धिजीवी, अरबन नैक्सलाइट, अंधभक्त, आदि आदि। आए दिनों आप हर
जगह इन्हीं शब्दों के इस्तेमाल देखते आ रहे हैं बिल्कुल वैसे ही जैसे मैं इन दिनों अपने पुराने घर की खिड़की से
बदहवास से भागते इन ‘लोहे के बैलों’ को देख रहा हूं। हमारे पास सड़क से संसद तक जो मानवता, सच्चाई,
सकारात्मक विरोध और साफ-सुथरी राजनीति की जो मिठास थी वह गायब कर दी गई है। जैसे वह इन्हीं लोहे के
बैलों के बेजान खुरों के नीचे रौंद ली गई हो। यह मिठास जिन चंद लोगों के पास बची भी है, वे जगह-जगह गायब
कर दिए जा रहे हैं। ऐसा लगता है हर कोई अब ‘लोहे के बैल’ से इनसानियत की खेती कर रहा है।

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