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सबसे ज्यादा निवेशकों का भरोसा भारत पर ही क्यों

-आर.के. सिन्हा–
कोरोना के कहर में एक सुखद खबर दब गई कि देश में वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान 81.72 अरब डॉलर का
प्रत्यक्ष पूंजी निवेश (एफडीआई) आया। यह पिछले वित्त साल की तुलना में दस फीसद अधिक ही रहा। इस अवधि
में दुनिया भर में भारत से अधिक एफडीआई का निवेश कहीं नहीं हुआ। इसे आप यूं भी समझ सकते हैं कि कोरोना
महामारी के बावजूद विश्व भर के विदेशी निवेशकों को भारतीय अर्थव्यवस्था पर विश्वास बना रहा। उन्हें लगा कि
भारत में निवेश कर उन्हें अच्छी रिटर्न मिल जाएगी। निश्चित रूप से एफडीआई के मामले में नीतिगत सुधारों,
निवेश आसान बनाने और कारोबार सुगमता के उपायों को लेकर सरकार की तरफ से उठाये गये कदमों से ही देश
में एफडीआई प्रवाह बढ़ा है। अगर यह बात न होती तो निवेश में इतना उछाल संभव ही नहीं था।
यह जानना भी जरूरी है कि सबसे अधिक निवेश किन देशों से आया? आपको हैरानी होगी कि सबसे अधिक निवेश
आया पड़ोसी द्वीप सिंगापुर और उसके बाद अमेरिका से। यह वही सिंगापुर है, जिससे भारत के अकारण संबंधों को
खराब करने की दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कुछ समय पहले नाकाम कोशिश की थी। उन्होंने अपने
बेहद निंदनीय बयान से दोनों देशों के संबंधों में तनाव तो पैदा कर ही दिया था। बिना किसी ठोस तथ्यों के
केजरीवाल जी भारत सरकार से कह रहे थे कि सिंगापुर में कोरोना का नया वेरिएंट आया है और वह बच्चों के लिए
ख़तरनाक है इसलिए वहाँ से हवाई सेवा बंद कर देनी चाहिए। पता नहीं ऐसे विचित्र सपने उन्हें कैसे आते हैं I
अरविंद केजरीवाल को सिविल एविएशन नीति पर बोलने का अधिकार ही नहीं है। वे भूल गए कि उनके एक बयान
से परम मित्र देश सिंगापुर के भारत से संबंधों में तल्खी आ सकती है। हो सके तो उन्हें कोई बता दे कि भारत में
सिंगापुर से कितना निवेश आ रहा है। उससे दिल्ली भी लाभान्वित होगी ही। खैर, यहां केजरीवाल की और अधिक
चर्चा का कोई मतलब भी नहीं है।
यह जानना भी समीचिन रहेगा कि क्या होता है एफडीआई? जान लें कि किसी एक देश की कंपनी का दूसरे देश में
किया गया निवेश ही एफडीआई कहलाता है। ऐसे निवेश से निवेशकों को दूसरे देश की उस कंपनी के मैनेजमेंट में
कुछ हिस्सा हासिल हो जाता है जिसमें उसका पैसा लगता है। एफडीआई दो प्रकार से आती है। पहला, ग्रीन फील्ड

प्रोजेक्ट में। इसे यूं समझ सकते हैं कि भारत में यदि कोई कंपनी स्थापित हो रही है और उसमें उसी अवस्था में
जब किसी अन्य देश की कंपनी निवेश करती है तब उसे ही ग्रीन फील्ड एफडीआई कहते हैं। दूसरा, कोई विदेशी
कंपनी पहले से चल रही किसी कंपनी के कुछ शेयर खरीद ले। यह भी कहलाता है एफडीआई। कई चोटी की
भारतीय कंपनियां भी अन्य देशों में निवेश करती ही रहती हैं।
एक तथ्य पर गौर करें कि भारत में सर्वाधिक एफडीआई आई.टी. सेक्टर में आया है। हम गर्व कर सकते हैं कि
कोरोना काल में भी भारत का आई.टी सेक्टर बेहतर प्रदर्शन करता रहा। इधर नौकरियों से लोग निकाले भी नहीं
गए। हमारे आईटी सेक्टर की औसत विकास दर सात फीसद सालाना से अधिक ही रही है। साल 2025 तक
आई.टी. राजस्व 350 अरब डॉलर होने की सम्भावना है। आईटी सेक्टर का भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी)
में करीब 8 फीसद का योगदान है जो हर साल बढ़ता ही जा रहा है। देश में 32 हजार के आसपास रजिस्टर्ड
आई.टी. कंपनियां हैं। आईटी सेक्टर देश के लिए सर्वाधिक विदेशी मुद्रा भी अर्जित करता है। देश के कुल निर्यात में
इसका हिस्सा करीब 25 फीसद है। इन सब वजहों के चलते भारत के आई.टी. सेक्टर को विदेशी निवेशक पसंद कर
रहे हैं।
देखिए, मौजूदा कोरोना संकट भारत के लिए एक अवसर बनकर भी आया है। भारत के सामने यह सुनहरा मौका है
कि वह दुनिया का मैन्यूफैक्चरिंग हब बन जाए। भारत चीन के खिलाफ दुनिया की नफरत का इस्तेमाल अपने लिए
एक बड़े आर्थिक अवसर के रूप में कर सकता है। इस वक्त देश के नीति निर्धारकों को बड़े पैमाने पर विदेशी
निवेश आकर्षित करने के उपाय तलाशने होंगे। निवेश संबंधी नियमों को सरल और लचीला बनाना होगा। विदेशी
निवेशकों का यथोचित सम्मान करना होगा जो हमारे यहां निवेश करने के इरादे से पूंजी लेकर आते हैं। उन्हें सारी
मूलभूत सुविधायें मुहैया करवानी पड़ेगी।
दरअसल कोई भी देश एफडीआई के प्रवाह के बिना आगे नहीं बढ़ सकता। इसीलिए मौजूदा सरकार अनेक कदमें
उठाती रही है। बेशक एफडीआई आर्थिक विकास का एक प्रमुख वाहक है। सभी देशों की सरकारों का यह प्रयास रहा
है कि वह एक सक्षम और निवेशकों के अनुकूल एफडीआई नीति लागू करे। यह सब करने का मुख्य उद्देश्य
एफडीआई नीति को निवेशकों के लिए और अधिक अनुकूल बनाना तथा देश में निवेश के प्रवाह में बाधा डालने
वाली नीतिगत अड़चनों को दूर करना है।
एफडीआई की ताजा आवक संबंधी आंकड़े यह दर्शा रहे हैं कि विदेशी निवेशकों को भारत में इस कठिन कोरोना
संकट के दौर में भी निवेश करना सही ही लग रहा है। उन्हें यकीन है कि भारत में धन निवेश करने से उन्हें
नुकसान नहीं होगा। वे यहां से कुछ कमाकर ही जाएंगे। एक बात साफ है कि जब कोई निवेशक कहीं धन निवेश
करता है, तो वह लाभ कमाने के इरादे से ही करता है।
केन्द्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारों को भी अपने यहां विदेशी निवेशकों को आकर्षित करना होगा। विदेशी
निवेशक तब ही आएंगे जब उन्हें काम करने के बेहतर विकल्प हासिल होंगे। आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक,
गुजरात, तमिलनाडू, हरियाणा जैसे राज्यों का तगड़ा विकास इसलिए होता रहा है, क्योंकि इनमें हर साल भारी निजी
क्षेत्र का निवेश आता है। केन्द्र सरकार हर साल एक रैंकिंग जारी करती है कि देश के किन राज्यों में कारोबार
करना आसान और कहां सबसे मुश्किल है। सरकार ने इसे "ईज ऑफ डूइंग बिजनेस" का नाम दिया है। इसमें पहले
पांच स्थानों पर उपर्युक्त राज्य छाए रहते हैं। बिहार का इसमें 15 वें स्थान तक कहीं नाम नहीं होता।

दरअसल इस रैंकिंग का उद्देश्य घरेलू और वैश्विक निवेशकों को आकर्षित करने के लिए कारोबारी माहौल में सुधार
लाने के लिए राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा शुरू करना है। सीधी बात है कि बगैर भारी और सतत एफडीआई के भारत
का चौमुखी विकास संभव नहीं है। भारत को सिर्फ आईटी सेक्टर के भरोसे नहीं रहना होगा। उसे अन्य तमाम क्षेत्रों
में एफडीआई खींचनी होगी।

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